Saturday, 22 August 2020

रामायण, महाभारत, सनातन काल, आर्यावर्त।

बौद्ध के दशरथ जातक कथा मे भी राम है, बाल्मीकि रामायण मे भी राम है तो क्या बाल्मीकि रामायण बुद्ध से पुराना हो सकता है? बाल्मीकि रामायण का उत्खनन प्रमाण शून्य है, फिर भी आप उसके कंटेंट देखे तो भी आप अनुमान लगा सकते है की वो काफी बाद की रचना है, लिपि के अनुसार तो वह 1000 सालो के अंदर सिकुड़ जाती है, मैनुस्क्रिप्ट के अनुसार तो 500 सालो के अंदर और कंटेंट के हिसाब से भी यह काफ़ी नई है।

उदाहरण के तौर पे, बाल्मीकि रामायण मे अयोध्या कांड सर्ग 109 श्लोक 34 मे तथागत  बुद्ध और उनके अनुयायीयों को चोर इत्यादि कह के दंड देने की बात कही है  (रेफ़्रेन्स : पेज 526, श्रीमद्बाल्मीकी रामायण गीताप्रेस गोरखपुर ) साइंस जर्नी की वीडियो 85, 66 देखे,  क्या कोई किताब बुद्ध का वर्णन करे और वो बुद्ध से पुरानी हो सकती है? 

इसके आलावा किष्किन्धाकांड के 43 सर्ग के  11, 12 श्लोक मे साफ तौर पे शक, यवन, म्लेच्छों का वर्णन है यहाँ मलेच्छ विदेशी आक्रांताओ के साथ साथ मुस्लिम के लिए भी इस्तेमाल किया जाता रहा है (रेफ़्रेन्स : पेज 880, श्रीमद्बाल्मीकी रामायण गीताप्रेस गोरखपुर), क्या कोई किताब शक, यवन, मलेच्छ, इत्यादि का वर्णन  करे तो क्या उसका लेखक उससे ज्यादा पुरानी बात जानता होगा? यानी ज्यादा से ज्यादा वहा तक जानता होगा।


अथार्त यह किताब काफी बाद मे और हजार वर्ष पुरानी देवनागरी स्क्रिप्ट पे मुस्लिम काल खंड मे ही रचित है। और सही मायनो मे कहा जाय तो बौद्ध की जातक कथा और जैन रामायण से कॉपीपेस्ट और तरोड मरोड़ कर बाल्मीकि रामायण की रचना हुई है।

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वाल्मीकि रामायण में जब हमुमान लंका में सीता जी की खोज करते हुए जाते हैं तो वो लंका का वैभव देख आश्चर्य करते हुए कहते हैं -

 स्वर्गोस्य देवलोकाsयमिन्द्रस्येयं पूरी भवते 
( वाल्मीकि रामायण, सुंदर कांड ,सर्ग -9 श्लोक 31)
हमुमान लंका को स्वर्ग के समान कहते, इंद्रलोक के जैसा वैभवशाली कह आश्चर्यचकित हो उठते हैं।

' भूमिगृहांशचैत्यगृहान उत्पतन निपतंश्चापि'
( सुंदर कांड , सर्ग 12, श्लोक 15
अर्थात हनुमान भूमिगृहों और चैत्यों पर उछलते कूदते हुए जाते हैं ।

चैत्य शब्द वाल्मीकि रामायण में बहुत बार आया है , अयोध्याकाण्ड में ही कम से कम तीन बार आ गया है।

अब जानिए चैत्य शब्द का अर्थ-
चैत्य- बुद्ध मंदिर ( संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ पेज 440)
चैत्य- चैत्यमायतने बुद्ध बिम्बे ( मेडिनिकोष)
अर्थात चैत्य ,बौद्ध मंदिर को कहते हैं।

कहने का अर्थ हुआ की लंका निश्चय ही बौद्ध नगरी रही होगी जंहा बौद्ध चैत्य बहुतायत थे ।

इसके अलावा , अयोध्या कांड सर्ग 109 के 34 वें श्लोक में कहा गया है-

'यथा हि चोरः स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि।
तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात् '

जिसका अर्थ गीता प्रेस की वाल्मीकि रामायण में इस प्रकार दिया है- जिस प्रकार चोर दंडनीय होता है उसी प्रकार वेदविरोधी बुद्ध ( बौद्ध मतावलंबी ) भी।

इसके अलावा 15 वीं शताब्दी के गोविंराजकृत व्याख्या में इस श्लोक में आये शब्द 'तथागत ' की व्याख्या करते हुए कहते हैं ' तथागत बुद्धतुल्यम'
अर्थात तथागत का अर्थ बुद्ध जैसा ।

सुरेंद्र कुमार शर्मा (अज्ञात) पुरातत्व वैज्ञानिक ई.बी. कॉडवेल का हवाला देके बताते हैं कि सुंदर कांड , सर्ग 9 से 13 तक में रावण के अंतःपुर के रात्रिकालीन दृश्य का चित्रण है ,जो अश्वघोष रचित ' बुद्धचरितम ( 5/57-61) के गोतम के अंत पुर के दृश्य का अनुकरण है जो की बुद्ध आख्यान का आवश्यक अंग है जबकि वाल्मीकि रामायण का अनावश्यक ।

रामायण में छेद वाली कुल्हाड़ी का जिक्र है, प्रसिद्ध पुरातत्व वैज्ञानिक डाक्टर हँसमुख धीरजलाल सांकलिया ने निष्कर्ष निकाला है कि ईसा पूर्व 300 से 500 से पहले भारत में छेद वाली कुल्हाड़ी का प्रयोग नहीं होता था।

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मार्कण्डेय से सुनी कथा के आधार पर -
भीष्म पितामह ने शुकदेव की शिक्षा - दीक्षा ,तप आदि का उल्लेख किया और अंत में बताया कि -

अन्तर्हितः प्रभावंत दर्शयित्वा शुकस्तदा । 
गुणान संत्यज्य शब्दानीन पदमभ्यगमत् परम् । । 26 । ।
 इति जन्म गतिश्चैव शुकस्य भरतर्षभ । 
विस्तरेण समाख्याता यन्मां त्वं परिपच्छसि । । 40 । । 
  
अर्थ : अपना प्रभाव दिखाकर शुकदेवजी शरीर त्यागकर परमपद ( मृत्यु ) को प्राप्त हुए युधिष्ठिर ! तुम जिनके विषय में मुझसे पूछ रहे थे ,उन शुकदेवजी के जन्म और मृत्यु की कथा मैंने तुम्हें विस्तार से सुना दी " 

यदि भीष्म पितामह की बात सत्य है , तो फिर शुकदेव ने परीक्षित को यह कथा कैसे सुनाई ? भीष्म के कथनानुसार तो शुकदेव पहले ही मर चुके थे और यदि शुकदेव ने परीक्षित को कथा सुनाई है ,तो भीष्म पितामह यहां युधिष्ठिर को झूठ बोलकर गुमराह कर रहे हैं कौन सच्चा है ,कौन झूठा है ? 

वास्तविकता तो यह है कि तथागत बुद्ध के मुकाबले में खड़ा करने के लिए महाभारत में कृष्ण को गढ़ना पड़ा और त्रिपिटक के मुकाबले मे महाभारत लिखना पड़ा।

बौद्धों के प्रसिद्ध निकाय ' दीघनिकाय ' में पंचशिख का नाम आता है, दीघनिकाय में आए पंचशिख जो तथागत बुद्ध के समकालीन थे , उनका वर्णन महाभारत में भीष्म पितामह के मुखारिवंद से किया गया है ।

यही नहीं संक्षिप्त महाभारत , द्वितीय खंड के पृष्ठ 437 पर सांख्य एवं योग का अंतर भी बताया गया है , जो यह सिद्ध करता है यह यह सांख्य एवं योग दर्शन के बाद में रचा गया।

किशा गौतमी की कहानी जिसमें तथागत ने उसके मृत बालक को जीवित करने के लिए एक मुट्ठी सरसो मंगाई थी , महाभारत के पृष्ठ 489 पर वर्णित है ,जिसे भीष्म ने सुनाया है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि महाभारत , जिसमें संग्रह ही संग्रह है ;तथागत बुद्ध के त्रिपिटक से मुकाबला करने के लिए की गई रचना है, त्रिपिटक के पांच निकायों में एक खद्दकनिकाय के क्रमसंख्या नौ में थेरीगाथाओं का वर्णन आता है इस थेरीगाथा ' के दसवां वर्ग में क्रमसंख्या 63 पर ' किशा गोतमी थेरीगाथा ' का वर्णन आता है।

आज मेरी पीड़ा का तीर निकल गया है,मैंने सभी प्रकार के बोझों ( कष्टों ) को दूर फेंक दिया है,अब मेरे सब कर्त्तव्य पूरे हो चुके हैं,अब मेरा चित्त सभी बंधनों से विमुक्त हो गया है - यह मैं किशा गोतमी कहती हूं,संक्षेप में किशा गोतमी की यही कहानी है,जिसे भीष्म ने सुनाया था,जिसे इतिहास का ज्ञान है ,वह तुरंत समझ जाएगा कि महाभारत कब लिखा गया ?.

यधिष्ठिर के यज्ञ में जो घोड़ा छोड़ा गया था ,उसके साथ -साथ चलने वाली सेना के वश में “ पाण्ड्य , द्रविड़ , उण्ड , केरल , आंध्र ताल वन ,कलिंग , उष्ट्रकर्णिक आटवीपुरी और आक्रमणकारी यवनों की राजधानियां भी हो गई,सहदेव के दूत के द्वारा लंकाधिपति के पास संदेश भेजा और विभीषण ने बड़े प्रेम से उसे स्वीकार कर लिया । सरस्वती तटवर्ती शूद्रों और आभीरों ( = अहीरों ) को वश में किया,पश्चिम के रामठ ,हार और हूण आदि राजा नकुल की आज्ञामात्र से उनके आधीन हो गए,म्लेच्छ ,पहल्व ,बर्बर किरात , यवन और शक राजाओं को वश में किया.

महाभारत में आए यवन ,शक , हूण -आदि शब्द स्पष्ट बता रहे हैं कि महाभारत की रचना कब हुई तथागत बुद्ध ने वैदिक काल के विरुद्ध विशेष रूप से तीन क्रांतियां की थीं -
1 .वैदिक हिंसामयी यज्ञों का विरोध और उनके स्थान पर अहिंसा की स्थापना किन्तु' अहिंसा परमो धर्मः ' की नहीं,यह सिद्धांत महावीर स्वामी का है.
2 . वैदिक वर्णव्यवस्था का खंडन और उसके स्थान पर समता ( = समानता ) की स्थापना .
3 . बाहरी शुद्धि की अपेक्षा आंतरिक शुद्धि अनिवार्य अर्थात तन की शुद्धि , मन की शुद्धि तथा वाणी की शुद्धि से परम पद ' निर्वाण ' की प्राप्ति “ पिछली पीढ़ी के पश्चिमी भारत के भारत के प्रसिद्ध विद्वान दिवंगत रायबहादुर चिंतामण राव वैद्य ने , जिन पर कि हम बौद्धों के पक्ष में होने के लिए तनिक भी आक्षेप नहीं कर सकते ,महाभारत के आदि पर्व पर की गई अपनी आलोचना में स्पष्ट तौर पर माना है,कि न केवल भारतवर्ष बल्कि संपूर्ण विश्व बौद्ध धर्म के प्रति दो बातों के लिए ऋणी है,एक तो पशुवध वाले यज्ञों के खिलाफ बौद्ध धर्म ने सफल और प्रभावपूर्ण आंदोलन चलाया , दूसरा यह कि बौद्ध धर्म के मन , वचन और कर्म की पवित्रता पर अत्यधिक जोर दिया,जन समुदाय में बौद्ध धर्म के प्रचार में ये बातें सहायक बनी, इस प्रकार के स्पष्ट चिन्ह हमें महाभारत में मिलते हैं इसमें हम एक साथ ही दोनों ढंग के परिच्छेद पाते हैं-
श्रीमद्भागवत समीक्षा-लेखक श्रीराम शर्मा-पृष्ठ-15-से 18 तक.
दीघनिकाय-पृष्ठ-181-182.
संक्षिप्त महाभारत द्वितीय खण्ड-पृष्ठ-364-गीता प्रेस गोरखपुर.
संक्षिप्त महाभारत-पृष्ठ-144-145.
  भारत की गुलामी में गीता की भूमिका-पृष्ठ-21-22-23-24.


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क्या बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म के बाद जन्मा है? 

संस्कृत व्याकरण के विद्वान् पतंजली 150 BCE में अपने ग्रन्थ महाभाष्य में लिखते हैं: “आर्यों की भूमि कौनसी है? यह सरस्वती नदी से पूर्व में है.

कालक वन के पश्चिम हिमालय के दक्षिण और परियत्र पर्वत  के उत्तर में” इसका सीधा अर्थ है कि पतंजली के समय में आर्यावर्त (आर्यभूमि) की एक पूर्वी सीमा थी जिसके परे कोई अन्य सभ्यता या धर्म था. 

पतंजली के चार शताब्दी बाद मानव धर्म शास्त्र में मनु लिखते हैं  “हिमालय और विन्ध्य के बीच प्रयाग पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र के बीच आर्यावर्त भूमि है”  

इसका अर्थ हुआ कि चार शताब्दी बादें पतंजली के लिए जो प्रदेश पूर्व में था वह मनु के लिए मध्यदेश बन जाता है. अर्थात यह क्षेत्र आर्यों द्वारा जीत लिया जाता है.

आर्यभूमि के प्रसार के लिए रास्ता अग्नि और यग्य द्वारा बनाया गया इसका अर्थ हुआ ये लोग जंगल जलाते हुए और युद्ध करते हुए आगे बढ़े.

मतलब साफ़ है, मनु तक आते आते वह पूर्वी प्रदेश जो आर्यों का नहीं बल्कि असुरों का था वह आर्यों द्वारा जीत लिया जाता है. पतंजली वर्णित कालक वन मनु द्वारा वर्णित प्रयाग या वर्तमान इलाहाबाद के निकट है.
 
पतंजली महाभाष्य के ही समान बाद के बौधायन धर्म सूत्र (१.२.९) और वशिष्ठ धर्म सूत्र (१.८-१२) कहते हैं कि गंगा और यमुना के बीच का क्षेत्र आर्यावर्त है. 

अन्य स्त्रोत से शतपथ ब्राह्मण (१३.८.१.५) कहता है कि पूर्व (बिहार की ओर) असुर जन रहते हैं (असुरायः प्राच्यः), ये लोग बड़े बड़े गोल आकार के धर्मस्थल बनाते हैं. 

बाद में महाभारत में उल्लेख है कि इश्वर और वेद को न मानने वाले और गोल गुंबद बनाने वाले असुर अभी भी बने हुए हैं. आगे महाभारत ने खराब समय के बारे में लिखा है ऐसे समय में शूद्र लोग द्विजों की सेवा करना छोड़ देंगे. 

इसका अर्थ हुआ कि ब्राह्मणों या आर्यों का और उनके धर्म का प्रसार पश्चिम से पूर्व की तरफ हुआ है. शतपथ ब्राह्मण की मानें तो पूर्व की तरफ असुर रहते थे जो सर घुटाये घूमते हैं और गोल गुंबद की तरह धर्मस्थल बनाते थे. 

ये गुम्बद असल में बौद्ध स्तूप हैं. ऐसी ही रचनाएं जैनों और आजीवकों की भी होती थीं. ये बौद्ध और जैन अहिंसक थे, युद्ध की भाषा में दक्ष नहीं थे. 

बाद में महाभारत काल तक असुर शूद्र बन चुके थें अर्थात आर्यों के गुलाम हो चुके थे और उनका बौद्ध धर्म क्षीण हो चुका था. 

अब गहराई से सोचिये, बौद्ध धर्म ब्राह्मण या आर्य आगमन से पहले भी अपने पूर्ण विक्सित रूप में था. इसका मतलब हुआ कि बौद्ध धर्म ब्राह्मण धर्म से न केवल पुराना है बल्कि पूरा ब्राह्मण धर्म बौद्ध धर्म के खिलाफ एक प्रतिक्रान्ति की तरह बुना गया है. 

यहाँ अंबेडकर एकदम सही साबित होते हैं.

इससे यह भी सिद्ध होता है कि गौतम बुद्ध अकेले नहीं हैं, जिस तरह वर्धमान महावीर के पहले तेईस तीर्थंकरों की एक लंबी श्रंखला रही है उसी तरह गौतम बुद्ध के पहले भी अन्य बुद्धों की एक लंबी श्रंखला है. 

जैनों ने हिन्दू ब्राह्मणों का अधिपत्य स्वीकार कर लिया. जैन मंदिरों और कर्मकांडों में ब्राह्मणों को मुख्य पुजारी की भूमिका बनाकर उनकी सत्ता स्वीकार कर ली इसलिए महावीर सहित अन्य तीर्थंकरों का इतिहास कुछ हद तक बचा रहा. 

लेकिन बौद्धों ने ब्राह्मण आधिपत्य स्वीकार न किया इसलिए वे समाप्त कर दिए गये, उनका इतिहास मिटा दिया गया. 

लेकिन अब बुद्ध और बौद्ध इतिहास फिर से प्रकट होकर रहेगा, इस भारत को दुबारा सभ्य बनाने के लिए बुद्ध लौट रहे हैं.


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क्या बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म के बाद जन्मा है? 

संस्कृत व्याकरण के विद्वान् पतंजली 150 BCE में अपने ग्रन्थ महाभाष्य में लिखते हैं: “आर्यों की भूमि कौनसी है? यह सरस्वती नदी से पूर्व में है.

कालक वन के पश्चिम हिमालय के दक्षिण और परियत्र पर्वत  के उत्तर में” इसका सीधा अर्थ है कि पतंजली के समय में आर्यावर्त (आर्यभूमि) की एक पूर्वी सीमा थी जिसके परे कोई अन्य सभ्यता या धर्म था. 

पतंजली के चार शताब्दी बाद मानव धर्म शास्त्र में मनु लिखते हैं  “हिमालय और विन्ध्य के बीच प्रयाग पूर्वी समुद्र से पश्चिमी समुद्र के बीच आर्यावर्त भूमि है”  

इसका अर्थ हुआ कि चार शताब्दी बादें पतंजली के लिए जो प्रदेश पूर्व में था वह मनु के लिए मध्यदेश बन जाता है. अर्थात यह क्षेत्र आर्यों द्वारा जीत लिया जाता है.

आर्यभूमि के प्रसार के लिए रास्ता अग्नि और यग्य द्वारा बनाया गया इसका अर्थ हुआ ये लोग जंगल जलाते हुए और युद्ध करते हुए आगे बढ़े.

मतलब साफ़ है, मनु तक आते आते वह पूर्वी प्रदेश जो आर्यों का नहीं बल्कि असुरों का था वह आर्यों द्वारा जीत लिया जाता है. पतंजली वर्णित कालक वन मनु द्वारा वर्णित प्रयाग या वर्तमान इलाहाबाद के निकट है.
 
पतंजली महाभाष्य के ही समान बाद के बौधायन धर्म सूत्र (१.२.९) और वशिष्ठ धर्म सूत्र (१.८-१२) कहते हैं कि गंगा और यमुना के बीच का क्षेत्र आर्यावर्त है. 

अन्य स्त्रोत से शतपथ ब्राह्मण (१३.८.१.५) कहता है कि पूर्व (बिहार की ओर) असुर जन रहते हैं (असुरायः प्राच्यः), ये लोग बड़े बड़े गोल आकार के धर्मस्थल बनाते हैं. 

बाद में महाभारत में उल्लेख है कि इश्वर और वेद को न मानने वाले और गोल गुंबद बनाने वाले असुर अभी भी बने हुए हैं. आगे महाभारत ने खराब समय के बारे में लिखा है ऐसे समय में शूद्र लोग द्विजों की सेवा करना छोड़ देंगे. 

इसका अर्थ हुआ कि ब्राह्मणों या आर्यों का और उनके धर्म का प्रसार पश्चिम से पूर्व की तरफ हुआ है. शतपथ ब्राह्मण की मानें तो पूर्व की तरफ असुर रहते थे जो सर घुटाये घूमते हैं और गोल गुंबद की तरह धर्मस्थल बनाते थे. 

ये गुम्बद असल में बौद्ध स्तूप हैं. ऐसी ही रचनाएं जैनों और आजीवकों की भी होती थीं. ये बौद्ध और जैन अहिंसक थे, युद्ध की भाषा में दक्ष नहीं थे. 

बाद में महाभारत काल तक असुर शूद्र बन चुके थें अर्थात आर्यों के गुलाम हो चुके थे और उनका बौद्ध धर्म क्षीण हो चुका था. 

रामसेतु।

रामसेतु शब्द किसी भी पाठ में नहीं मिला है। वाल्मीकि रामायण में वर्णित पुल का नाम रामसेतु नहीं बल्कि नलसेतु है क्योंकि इसे राम के कहने पर नल और अन्य बंदरों ने बनाया था।

संगम च समुद्रास्य नालस्योश्च बंधनाम्
अर्थात्: राम वहाँ पहुँचते हैं, समुद्र के संगम को देखते हैं और एक पुल का निर्माण करते हैं। (वाल्मीकि रामायण: १/३/३४)

ध्योजनवृष्टिविद्या शतयोजनमायतम् ददतुश्चर्ददेवराधर्वाः नलसेतुं सुदुष्करम्।
वानरो ने पहले दिन 14 योजन, दूसरे दिन 20 योजन, तीसरे दिन 21 योजन, चौथे दिन 22 योजन, पांचवें दिन 23 योजन का निर्माण किया।

इस नल द्वारा निर्मित नलसेतु देवता और गंधर्व हैं।
(वाल्मीकि रामायण: 6/22/76)

इसके निर्माण में 5 दिन लगे थे। 1 योजन का मतलब 8-9 मील है। रामायण में वर्णित पुल 1288 किमी लंबा और 128 किमी चौड़ा है। अब पुल की वास्तविक लंबाई केवल 30 किमी लंबी और 10 फीट चौड़ी है।
 
रामायण में 30 किमी और 1288 किमी लंबे पुल का अंतर जमीन आसमान का है। पुल कंहा गायब हो गया है। अगर डूब गया तो पानी के नीचे पत्थर होने चाहिए थे।

पानी पर तैरते पत्थरों का राज क्या है। उज्जैन साइंस कॉलेज के पूर्व विभाग प्रमुख डॉ। आरएन तिवारी के अनुसार, ज्वालामुखी के बाद लावा जमने के बाद ऐसी चट्टानें बनती हैं, जो कम घनत्व के कारण पानी पर तैर सकती हैं।
 इन पत्थरों को प्यूमिस स्टोन कहा जाता है।

'नासा' ने अपने शोध में भारत और श्री लंका के बीच में एक पुल जैसी संरचना की बात की थी. लेकिन ये भी स्पस्ट कर दिया था, की ये मानव निर्मित नहीं बल्कि प्राकृतिक है. वास्तव में ये संरचना ' कोरल रीफ ' से बनी हुई है. कोरल रीफ समुद्र में रहने वाले जीवे है.इनके उपर कैल्शियम कार्बोनेट के मोटी परत चड़ी रहती है जिससे इनकी संरचना टेड़ी मेडी बिलकुल पत्थरनुमा हो जातीहै. सामान्यता ये जीव संसार में 10 से 20 डिग्री नार्थ और 20 डिग्री साउथ में पाए जाते हैं. ये अपनी. कॉलोनी उथले समुद्र में बनाते है. भारत और श्री लंका के बीच समुद्र की गहराई कम होने के कारन ये स्थान कोरल के लिए अनुकूल है. कोरल रीफ ने यहाँ पर अपनी कॉलोनी बनायीं है जिससे कठोरे चट्टानें बन गयी हैं जिन्हें सेतु समुद्रम परियोजना में तोडा जाना था किन्तु मूर्ख राम भक्तो के कारन ये नहीं हो पा रहा है. यदि कोरल रीफ की पत्थर नुमा संरचना को पानी में डाला जाता है तो वो तरते हुए पत्थर की तरह ही दीखता है.समुद्र के पास जीवित कोरल भी देखे जा सकते हैं . इन्ही के ऊपर राम का नाम लिख कर लोगो को बेवकूफ बनाया जाता है . वास्तव में जिस रामसेतु की बात राम भक्त करते रहे हैं .वो संरचना कोरल रीफ से हजारों साल में बनी है. और पुरे वर्ल्ड में ये संरचनाये देखि जा सकती है . इसका सबसे बड़ा उदाहरण ऑस्ट्रेलिया की 'ग्रेट बेरियर रीफ' है. जो हजारों किलोमीटर लम्बी धनुषाकार रचना है. ये वर्ल्ड की सबसे बड़ी कोरल रीफ की संरचना है. उथले समुद्र में होने के कारन इन सभी संरचना को उपग्रह से देखा जा सकता है.


नियोग।


नियोग का मतलब है कि अगर पति नपुंसक है या समय से पहले मर जाता है, तो महिला को अन्य नियुक्त पुरुष के द्वारा बेटे को जन्म देना चाहिए। मनुस्मृति ने बड़े भाई की पत्नी के साथ छोटे भाई की नियुक्ति और छोटे भाई की पत्नी के साथ बड़े भाई की नियुक्ति का समर्थन किया है।

(मनुस्मृति अध्याय 9 में श्लोक 55 से 65)

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वैदिक धर्म जो पति और पत्नी दोनों को व्यभिचार का आदेश देता है।

बाल विवाह व पीडोफाइल।

मनुस्मृति के 9 वें अध्याय के श्लोक 94 में मनु कहते हैं कि 30 साल के पुरुष को 12 साल की लड़की से शादी करनी चाहिए और 24 साल के लड़के से 8 साल की लड़की से शादी करनी चाहिए।


यही कारण है बाल विवाह बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। ऊपर से कहा गया है कि 12 साल की खूबसूरत लड़की से शादी करनी चाहिए। यह नियम उल्टा क्यों नहीं है कि 8 साल का लड़का 24 साल की लकड़ी से शादी क्यों नहीं कर सकता। कितने मनुस्मृति समर्थक अपने घर में 8 साल की लड़की से 24 साल के आदमी से शादी करने के लिए तैयार हैं।

विरोधी तर्क:

वेद विरोधी गीता।

वेदो की निंदक गीता।

पुस्‍तक ''क्‍या बालू की भीत पर खड़ा है हिन्‍दू धर्म?'' डा. सुरेन्‍द्र कुमार शर्मा 'अज्ञात' विषय ''वेदों की निंदक गीता'' में लिखते हैं कि वेद और गीता के अरिक्ति सभी धर्म ग्रंथ मानव रचित माने जाते है। वेदों और गीता का विषयगत विश्‍लेषण इस निर्णय पर ले जाता है कि ये दोनों धर्म ग्रंथ एक ही 'धर्म' के नहीं हो सकते और नही इन का र‍चयिता एक ही तथाकथित परमात्‍मा हो सकता है।

वेदों में जगह जगह इच्‍छा और कामना पर बल दिया गया है-
कुर्वन्‍नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्‍छतं समाः
एवं त्‍वयि नान्‍य‍थेतोऽस्ति न कर्म लिप्‍यते नरे- यजु 40/2
अर्थातः हे मनुष्‍यों, कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्‍छा करो

जबकि गीता कहती है-
मा कर्मफलहेतुर्भूः - गीता 2/47

अयुक्‍त- काकारेण फले सक्‍तो निबध्‍यते - गीता 5/12
अर्थात फल की इच्‍छा रखने वाले व्‍यक्ति फल में आसक्‍त होते हैा और बंधन में पड़ते हैं।

वेदों की ऐसी खाल तो नास्तिकों ने भी नहीं उतारी होगी जैसी गीता ने उतारी है, गीता में वेदों के नाम पर गलत बयानी की गई है, वेदों में कहीं भी ईश्‍वर को 'पुरूषोत्‍तम' नहीं कहा गया, लेकिन गीता के 15 वें अध्‍याय में गीता का वक्‍ता स्‍वयंभू ईश्‍वर कहता हैः
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित- पुरूषोत्तमः - 15/18
अर्थात में लोक और वेद में 'पुरूषोत्तम' के नाम से प्रसिद्ध हूं

वेदों में अवतारवाद का सिद्धांत है, वेदों में परमात्‍मा के अवतार धारण करने का कहीं उल्‍लेख नहीं मिलता, पर गीता का यह एक प्रमुख सिद्धांत है
यदा यदा हि धर्मस्‍य ग्‍लानिर्भवति भारत
अभ्‍युतथानमधर्मस्‍य तदात्‍मानं सृजाम्‍यहम
परित्राणाय साध्‍ूनां विनाशाय च दुष्‍क़ताम्
धर्म संस्‍थापनार्थाय संभवामि युगेयुगे - गीता 4/7-8
अर्थात जब जब धर्म की ग्‍लानि होती और अधर्म की उन्‍नति होती है, तब तब मैं अर्थात (भगवान कृष्‍ण) पैदा होता हूं, साधुओ की रक्षा और पापियों के विनाश के लिए तथा धर्म को स्थापित करने के लिए मैं हर युग में पैदा होता हूं

एक धर्म के दो धर्मग्रंथों में ऐसा पारस्‍पारिक विरोध हिन्‍दू धर्म की ही विशेषता है , हम दोनों धर्म ग्रंथों में से एक को पूरी तरह अस्‍वीकार करें, विद्वानों का एक विशेषतः आर्यसमाजियों ने पिछली शताब्‍दी में ही वेद और गीता के इस पारस्‍पारिक विरोध को पहचान कर अपने अपने ढंग से इस का परिहार करने की कोशिशें शुरू कर दी थीं।

स्‍वामी दयानंद सरस्‍वती के शिष्‍य प. भीमसेन शर्मा ने इस और सब से प्रथम ध्‍यान दिया और कदम भी उठाया, उन्‍होंने देखा कि गीता का ईश्‍वर साकार है जो वेदों में कथित निराकार ईश्‍वर के सिद्धांत के विपरीत है अत- उन्‍होंने जिस जिस श्‍लोक में भी 'अहं' या पद 'मा' पद देखा उस उस श्‍लोक को झट अर्ध चन्‍द्र दे कर बाहर निकाल दिया और लगभग 238 श्‍लोकों को प्रक्षिप्‍त बता कर निकाल बाहर किया।

इस दिशा में एक दूसरे आर्यसमाजी विद्वान प. आर्य मुनि ने इस यक्ष पशन के समाधान के लिए एक और ढंग अपनाया, उन्‍होंने जहां 'अहं' पद देख वहां उस का अर्थ ' ईश्‍वर' कर दिया और जहां मा शब्‍द मिला, वहां उसका अर्थ वैदिकधर्म कर दिया (देखें प. नरदेव शास्‍त्री वेदतीर्थ कृत 'आर्य समाज का इतिहास, पृ. 235) किंतु प. भीमसेन के प्रयास की तुलना में यह दूसरा प्रयास उपहास्‍पद है.

इनके अतिरिक्‍त इस दिशा में और भी प्रयास किए गए, पञ भूमित्र शर्मा आर्योपदेशक और प. शिदत्त शास्‍त्री ने भास्‍कर प्रसे मेरट से गीता एक संस्‍करण छपवाया जिस में केवल 13 अध्‍याय रखे, बाद में लाहौर से एक और संस्‍करण निकाला गया उसमें केवल 70 श्‍लोक रख्‍ो गए, शेष 630 ष्‍लोगा निकाल फेंके गए।

यह काटछांट का तरीका उपरी लीपापोती ज्‍यादा कारगार सिद्ध न हुआ, आर्य समाजी वेद और गीता में से एक के वरण और दूसरे के परित्‍याग पर उतारू हैं। आर्यसमाजियों के विद्वतापूर्ण् प्रयासों से वेद और गीता के मध्‍य की खाई और गहरी हो गयी है, लगता है गीता भक्‍तों और वेदानुयायियों में ध्रुवीकरण हो जायेगा, इस के साथ ही जनता में फैलाया व फैला यह अंधविश्‍वास कि 'वेद और गीता एक ही चीज हैं' भी समाप्‍त हो जाएगा

गीता एक ही ब्रह्म के रचे हुए हैं सुनिए कृष्‍ण के द्वारा ही-
ॐ तत्‍सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्‍पृतः
ब्राह्मणास्‍तेन वेदाश्‍च यज्ञाश्‍च विहिता पुरा - गीता 17/23
अर्थात हे अर्जुन, ओम् तत, सत ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानंदधन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेदा यज्ञ आदि रचे गए हैं।

गीता में कृष्‍ण स्‍्पष्‍ट घोषना कर रहे हैं कि सब से प्रमुख वेद सामवेद में ही हूं:-
वेदानां सामवेदा स्मि - गीता 10/22

पुस्‍तक ''कितने अप्रासंगिक हैं धर्मग्रंथ'' में स. राकेशनाथ विषय 'गीता कर्मवाद की व्‍याख्‍या या कृष्‍ण का आत्‍मप्रचार'' में लिखते हैं गीता में कृष्‍ण्‍ ने अधिकांश समय आत्‍मप्रचार में लगाया है, गीता के अधिकांश श्‍लोकों में 'अस्‍मद' शब्‍द का किसी न किसी विभक्ति में प्रयोगा किया गया है, 'अस्‍मद' शब्‍द उत्तम पुरूष के लिए प्रयोग किया जाता है हिन्दी में इसका स्थानापन्‍न शब्‍द 'मैं' है।

गीता में कुल 700 श्‍लोक हैं, कृष्‍ण ने 620 श्‍लोक कहे।
375 बार 'मैं' का प्रयोग किया, इससे यह निष्‍कर्ष निकाला जा सकता है पूरी गीता में कृष्‍ण में, मुझ को, मैं ने, मेरे लिए, मेरा आदिा शब्‍दों द्वारा अपनी ही बात कहते रहे हैं, अर्जुन के लिए जो कुछ कहा वह अपनी बात समझने का जोर डालने के लिए।

गीता के कुछ स्‍थलों का दर्शन कराते हैं, जिन में कृष्‍ण द्वारा प्रयुक्‍त 'मैं' की भरमार से आप प्रभावित (बोर) हुए बिना नहीं रहेंगे, तब आप सरलता से अनुमान लगा सकेंगे कि गीता का नियमित पाठ करने वाले कितने बोर होते होंगे या उस का अर्थ जाने समझे बिना पढते जाते होंगे।

सातवें अध्‍याय में 30 श्‍लोक हैं, इन में से दो श्‍लोकों (20 व 26) को छोड कर शेष सब के साथ 'मैं' मौजूद है, कुछ पंक्तियां देखिए-
श्रीमद् भगवद् गीता 7/6/11 का अनुवादः
अर्थात में सारे संसार का उत्‍पत्त‍ि और प्रलय सथान अर्थात मूल कारण हूं, मेरे (6)अतिरिक्‍त दूसरी वस्‍तु कुछ भी नहीं, यह सारा संसार मुझ में इस प्रकार गुंथा हुआ है जैसे धागे में मणियां पिरोई रहती हैं (7) है अर्जुन में जल में रहस हूं तथा सुर्य चंद्रमा में प्रकाश हू, मे सारे वेदों में ओंकार हूं, मैं आकाश में शब्‍द हूं, मैं मनुष्‍यों में पुरूषार्थ हूं (8) मैं धरती में पवित्र गंध हूं और में अग्नि में तेज हूं, मैं सारे प्राणियों में जीवन तथा तपस्वियों में तप हूं (9) है पार्थ मुझे सारे प्राणियों का सनातन कारण समझ में बुद्ध‍िमानों की बु‍द्धि‍ और मैं तेज वालों का ते जूं (10) में बलवानों का काम तथा राग रहित बल हूं,मैं प्राणियां में र्ध्‍मानुकूल कामवासना हूं (11)

कया कृष्‍ण जी से यह पूछा जा सकता है कि जब आपके सिवा सारे संसार में कुछ है ही नहीं तो ये बढिया वस्‍तुएं छांटने से क्‍या लाभ?

नौवं श्‍लोक में 34 श्‍लोक हैं और सब के सब क़ष्‍ण की मैं से भरे पडे हैं,

दस्‍वें अध्‍याय में तो कमाल की कर दिया इस अध्‍याय में कृष्‍ण ने 33 श्‍लोक कहें जिन में 96 में 'शब्‍द' का प्रयोग हुआ है, इन में कृष्‍ण ने अच्‍छी अच्‍छी वस्‍तुएं छांट कर उन्‍हें 'स्‍वयं' बताया है।

जैसे हे अर्जुन में सब प्राणियों के ह्रदय में रहने वाला हू, मैं प्राणियों का आदि हू, मैं मध्‍य हूं, मैं अन्‍त हूं, मैं अतिति के पुत्रों में विष्‍णु हूं, मैं ज्‍यातिषियों में सूर्य हूं, में देवताओं में इंदब हूं, मैं इंद्रियों में मन हूं, में भूतों में चेतना हूं, मैा एकाद रूद्रों में शंकर हूं, मैं यक्ष राक्षसों में कुबेर हूं, मैं आठ वसुओं में अग्नि हूं, मैं पर्वतों में मेरू हूं,...

अगर आजकल कृष्‍ण किसी को गीता का उपदेश दें तो उन्‍हें अपनी विभूतियों में निम्‍नलिखित तत्‍व और बढाने पडेंगे, ''है अर्जुन में आयुधों में परमाणु हूं, रेलगाडियों में डीलक्‍स हूं, नेताओं में जवाहरलाल नेहरू हूं, सिने गाय‍िकाओं में लतामंगेश्‍कार हूं, होटलों में 'अशोका होटल' हूं, चीनियों में माओत्‍से तुंग हूं, प्रधान मंत्रियों में चर्चिल हूं, फिल्‍मों में 'संगम' हूं, मदिराओं में ह्वि‍स्‍की हूं, पर्वतारोहियों में तेनसिंह हूं, ठगों में नटरलाल हूं''

न जाने कैसा विचित्र समय था और कैसे अज्ञानी लोग थे, ईश्‍वर को भी जानने वाला कोई नहीं था उसे अपना परिचय स्‍वयं कराना पडा, अपनी एक एक बात विस्‍तारपुर्वक बतानी पडी नीति तो यह बताती है कि अपने गुणों का स्‍वयं बखाने करने से इंद्र भी छोटा बन जाता है।
'इंद्रोऽपि लघुतां याति स्‍वयं प्रख्‍यापितैर्गुणै'

खीर खा कर और अंडों से बच्चे।

राम का जन्म कौशलया के द्वारा खीर खाने और एक रात घोड़े के पास रहने से हुआ था।

आप जानते हैं कि अश्वमेध यज्ञ क्या है। जिसमें रानी को घोड़े पर बिठाया जाता था। अश्वमेध यज्ञ राजा दशरथ द्वारा किया गया था। इस बलिदान का उल्लेख बालकाण्ड के संता 14 में मिलता है।



300 पशुओं और राजा दशरथ के महान घोड़े को बलि के लिए बांध दिया गया था (श्लोक 32)
रानी ने कुशलता से घोड़े की परिक्रमा की और तीन बार तलवार से स्पर्श किया (33)
धर्म का पालन करने की इच्छा करते हुए, उसने कुशलता से एक रात घोड़े के पास बिताई (34)
बाद में 36, 37, 38 श्लोकों में यह उल्लेख किया गया है कि आहुति दी गई थी।


 
इस यज्ञ के बाद, पुत्रेष्टि यज्ञ क्या गया।  इस यज्ञ के कारण तीनों रानियाँ खीर खा कर गर्भवती हो गईं। बालकाण्ड सर्ग 16 देखें।

एक महान व्यक्ति बलिदान से प्रकट हुआ (श्लोक 11)
 प्रकट पुरुष ने दशरथ से कहा..
यह देवताओं द्वारा बनाई गई खीर है जो बच्चों को जन्म देती है और धन और स्वास्थ्य को बढ़ाती है (श्लोक 19)।
 इस खीर को उसकी पत्नियों को खिलाने से वह गर्भवती हो जाएगी (20)


राजा की तीनों रानियाँ इसे खाकर गर्भवती हो गईं (31)।


(देखें गीताप्रेस गोरखपुर, वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड 14 श्लोक 1 से 38 और बालकाण्ड, श्लोक 16 से 32)


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भागवत पुराण में मंत्र का पानी पीने से स्त्री को गर्भ धारण करवाना।

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ब्रह्मपुराण मे लिखा है कि मोरनी मोर के आंसू पीकर गर्भ धारण करती है, क्योकि मोर ब्रह्मचारी होता है!

अब मै महाभारत से एक ऐसी ही बात बता रहा हूँ.....  
कश्यप ऋषि की तेरह पत्नियाँ थी, उन्होने ही समस्त जीव-जन्तुओं को जन्म दिया था (इस पर मैने पूर्व मे पोस्ट की थी) उनकी दो पत्नियो के नाम कद्रु और विनता थे....
कद्रु से सांप और विनता से अरुण तथा गरुण का जन्म हुआ था!

कश्यप ऋषि की ये दोनो पत्नियाँ जब गर्भवती हुई तो इन्होने बच्चो को जन्म नही दिया, बल्कि कद्रु ने एक हजार और विनता ने दो अंडे दिये थे.......  उन अंडो को दासियों ने प्रसन्न होकर गर्म बर्तन मे रख दिया जिसमे से कद्रु के हजार नाग,सांप और तक्षक पैदा हुये!
पर विनता के अंडे मे से बच्चे नही निकले तो उन्होने जल्दबाजी मे खुद एक अंडा फोड़ दिया, जिसमे वरुण देव थे.....
वरुण को बहुत गुस्सा आया...    और बोले कि तुमने मुझे समय से पहले अंडा फोड़कर बाहर निकाला इसलिये मै तुम्हे श्राप देता हूँ सैकड़ो वर्षो तक तुम अपनी सौतन की नौकरानी रहोगी....

अब जरा विचार करो कि अगर महिलाऐं उस काल अंडे देती थी और बच्चा अंडे से निकलकर माँ श्राप देता था, तो मोरनी वाली बात भी आश्चर्यजनक नही हो सकती।


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एक बार विष्णु जी ने किसी बात पर नाराज होकर लक्ष्मीजी को घोड़ी बनने का श्राप दे दिया..... फिर क्या था पलक झपकते ही लक्ष्मी घोड़ी बन गयी!
विष्णु ने निवारण के लिये कहा कि जब तुम एक पुत्र को जन्म दोगी तो फिर से अपने वास्तविक स्वरूप मे आ जाओगी!

लक्ष्मी जी घोड़ी बनकर सुपर्णाक्ष नामक स्थान पर आ गयी, और सोचने लगी कि मै जब तक पुत्र को जन्म नही दूँगी तब तक श्रापमुक्ति नही मिलेगी, पर पुत्र होगा कैसे?

यही विचार करके उन्होनेे शिवजी को ध्यान लगाया.....

भगवान शिव समझ गये कि जब तक पुत्र नही होगा ये बेचारी घोड़ी ही बनी रहेगी.......
पर पुत्र होगा कैसे?

ये यहाँ है, और विष्णु वैकुण्ठ मे.....  लक्ष्मी किसी दूसरे घोड़े के साथ मुँह काला करना नही चाहती थी....

यही सोचकर शिव ने विष्णु को फटकार लगायी, शिव की बात मानकर विष्णु शीघ्र घोड़ा बनकर लक्ष्मी के पास पहुँचे और फिर दोनो के संसर्ग से लक्ष्मी ने एक पुत्र को जन्म दिया!
इस पुत्र का नाम "एकवीर" रखा और यही आगे चलकर क्षत्रियों के हैहयवंश जन्मदाता बना।

अब सवाल यह है कि क्या यह कहानी सच है? अगर सच है तो विष्णु कैसे भगवान है जो खुद की पत्नि और समृद्धि की देवी लक्ष्मी को घोड़ी बना देते है!
क्या खुद को गौरवशाली समझने वाले हैहयवंशी क्षत्रिय घोड़ी से पैदा हुऐ?
क्या हिन्दुओं के सर्वमान्य परमेश्वर विष्णु इतने निर्लज्ज थे कि घोड़ा/घोड़ी बनकर पुत्र पैदा करते थे?

ये कथा कई प्रश्न पैदा कर रही है, जिस पर आप भी विचार कर सकते हो! वैसे पुराणों मे लिखी हर कथा को महंत और कथावाचक लोग नाच-गाकर बताते हैं, पर इस कथा को पंडे-पुरोहित दबाकर ही रखते हैं! मै चाहता हूँ कि इस कथा के माध्यम से आप सब धर्माधिकारियों से सवाल करो कि विष्णु कैसे भगवान थे जो खुद की पत्नि को घोड़ी बनाते थे और दूसरे (जलंधर) की पत्नि (वृन्दा "तुलसी" ) से छल करते थे!

श्रोत:- देवीपुराण/छठा स्कन्ध (अध्याय-18, पृष्ठ संख्या- 442)


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आज आधुनिक समय मे विज्ञान ने भले ही इतनी तरक्की कर ली है, फिर भी मानव के अण्डकोष (Testis) का प्रत्यार्पण शायद ही कभी हुआ हो!

अण्डकोष जन्म के समय से ही पुरुष शरीर का महत्वपूर्ण अंग होता है!
यह पुरुषत्व का प्रमाण होता है, और शरीर मे उत्तेजना हेतु द्रव का निर्माण करता है! यह चमड़े की एक सिकुड़ी थैली जैसी होती है, जिसमे दो स्क्रोटम होते है!

यह स्क्रोटम दो भागो मे बटा होता है, जो लिंग (Penis) के अगल-बगल नीचे की और होता है!
पुरुष का बायाँ अण्डकोष दायें से थोड़ा अधिक लटका रहता है, और ये स्क्रोटम ठंड मे सिकुड़ जाते हैं, जबकि उत्तेजना के समय ऊपर की और आ जाते है!

जब मनुष्य प्रजनन करता है तो उसके दो अंग बहुत महत्वपूर्ण होते है!
पहला अण्डकोष, और दूसरा लिंग!

अण्डकोष का काम होता है कि वह पहले पुरुष को उत्तेजित करने के लिये हारमोन्स तैयार करता है, और बाद मे शुक्राणु (Sperm) बनाता है!
लिंग इन्ही शुक्राणुओं को स्त्री के योनिमार्ग से गर्भाशय तक पहुँचा देता है, और स्त्री गर्भवती हो जाती है!

अब आप सोच रहे होंगे कि मै ये सब क्यों बता रहा हूँ, तो इससे ही जुड़ा मेरे पास एक धार्मिक प्रश्न है!

रामायण के अनुसार जब देवराज इन्द्र ने गौतम ऋषि का वेष बनाकर उनकी पत्नि अहिल्या से दुष्कर्म किया, तब ऋषि गौतम ने उन्हे श्राप दिया था कि- "हे इन्द्र! मै तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम्हारा अण्डकोष कटकर भूमि पर गिर जाऐं"

ऋषि के श्राप से इन्द्र अण्डकोष विहीन हो गये, देवताओं के लिये यह बड़ी शर्म की बात थी कि उनके राजा के पास अण्डकोष ही नही था!
सारे देवताओं ने एक उपाय खोजा और देवराज को एक भेड़े (Sheep) का अण्डकोष लगा दिया!

यह वैदिककाल की पहली सफल अण्डकोष सर्जरी थी, जिसमे एक मनुष्य को एक जानवर का अण्डकोष प्रत्यार्पण किया गया!

अब सवाल यह है कि इन्द्र और उनकी पत्नि शचि की दो संतान थी, पुत्र जयन्त और पुत्री जयन्ती!
अब अगर इन्द्र ने भेड़ वाले अण्डकोष से प्रजनन किया तो उनकी संतान भेड़ जैसी पैदा होनी चाहिये थी, क्योकि भेड़ का अण्डकोष भेड़ के ही DNA वाले शुक्राणु (Sperm) पैदा करेगा!

दूसरा सवाल देवता इतने शक्तिशाली थे कि संसार मे कोई भी कार्य उनके लिये असम्भव नही था, फिर देवराज को क्या जरूरत थी कि वो भेड़े का अण्डकोष इस्तेमाल करें...

मेरा आशय देवी-देवताओं का मजाक बनाना नही है, मै केवल यह बताना चाहता हूँ कि धर्मग्रंथों मे लिखी बातें 80% झूठी है, इस पर विश्वास करने का कोई ठोस प्रमाण नही है!

यह सारा वृतान्त बाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड, सर्ग-49 पृष्ठ सं०-123 पर लिखा गया है!



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वेदों मे दो देवताओं का वर्णन मिलता है जिन्हे 'अश्विनीकुमार' कहा जाता है!
यह वही अश्विनीकुमार है जिन्होने पाण्डु की दूसरी पत्नि माद्री से 'नियोग' करके "नकुल और सहदेव" को पैदा किया था! ये अश्विनीकुमार पुराणों मे सूर्य के पुत्र माने गये हैं, पर इनके जन्म की कथा भी बड़ी रोचक है!

"ब्रह्मपुराण" हिन्दूधर्म का प्रथम पुराण है, जो सबसे पहले लिखा गया और जिसे सारे पुराणों से अधिक प्रमाणिक माना जा सकता है! इसी ब्रह्मपुराण के "गारुड़तीर्थ और गोवर्धनतीर्थ की महिमा" अध्याय मे एक कथा आती है....
सूर्यदेव की पत्नि का नाम ऊषा था, ऊषा बहुत सुन्दर और पतिव्रता थी तथा सूर्य से उसने दो पुत्र मनु और यम को जन्म दिया था, इसके अलावा उनकी एक पुत्री यमुना भी थी!
ऊषा यूँ तो सूर्यदेव से बहुत प्रेम करती थी, पर कई बार उससे सूर्य का तीव्र ताप सहन नही होता था! वह चाहती थी कि कुछ दिनों के लिये सूर्य से दूर कही शीतल जगह पर विश्राम करने चली जाये, पर उसे यह भी मालुम था कि सूर्य उसके बिना रह नही पायेगे, और व्याकुल होकर खोजने लगेगे!
एक दिन ऊषा ने एक उपाय निकाला, उसने अपने ही जैसी एक दूसरी महिला "छाया" को अपनी माया से बनाया और उसे समझाया कि तुम मेरी जगह सूर्य की प्रेयसी बनकर रहो, तथा मेरी आज्ञा से मेरे पति (सूर्य) की सेवा और मेरे बच्चों का पालन करो, और हाँ... यह भेद किसी से प्रकट मत करना! 
छाया को ऐसा आदेश देकर, उसे अपने ही कक्ष मे छोड़कर ऊषा सूर्य से दूर चली गयी! उसने सोचा कि सूर्य छाया को देखकर उसे ही समझेगे और ढ़ूढ़ेगे नही!

शाम को जब सूर्यदेव भ्रमण से वापस आये तो वो न जाने कैसे छाया को देखकर यह पहचान लिया कि यह मेरी पत्नि ऊषा नही है, अतः वो व्यग्र होकर ऊषा को खोजने लगे!

इधर ऊषा उत्तरकुरू नामक स्थान पर आयी और "घोड़ी" का रूप बनाकर तप करने लगी! सूर्यदेव ऊषा को खोजते हुये उसी स्थान पर पहुँचे, और घोड़ी बनी ऊषा को देखकर पहचान गये तथा खुद भी घोड़ा बनकर उसके पास गये! ऊषा घोड़े को देखकर उसकी नियत भांप गयी, और पर-पुरुष की आशंका से वह भागकर गौतमी नदी के तट पर आ गयी! सूर्यदेव घोड़ा बनकर उसका पीछा करते हुये वहाँ भी पहुँच गये, और तब उन्होने घोड़ीरूपी ऊषा को बताया कि मै तुम्हारा पति सूर्य हूँ!
इसके बाद घोड़ीरूपी ऊषा ने घोड़ारूपी सूर्य से समागम किया तथा उसी के परिणाम-स्वरूप दोनो अश्विनीकुमारों का जन्म हुआ!

अब जरा सोचना कि घोड़ी बनी ऊषा मनुष्य जैसे पुत्रों को जन्म कैसे दे सकती है?
दूसरी बात क्या जानवर-योनि मे देवों को सहवास करने मे अधिक आनन्द आता था, जो वो ऐसा प्रयोग करते थे?
तीसरी बात यदि वो ऐसा करते ही थे तो पौराणिक-लेखकों को क्या जरूरत थी इसे लिखने की?

हाँ.... चौथी बात मेरी तरफ से, पढ़ो और आनन्द लो, क्योंकि इसे पढ़ने के बाद पोर्न-मूवी देखने की भी इच्छा नही होगी!




भाभी के साथ संभोग।


बृहस्पति ऋषि ने बड़े भाई की पत्नी के साथ बलात्कार किया। महाभारत में बृहस्पति और ममता की कहानी है।

एक ज्ञानी ऋषि थे जिनका नाम उतथ्य था, उनकी एक सुंदर पत्नी थी जिसका नाम ममता था। (श्लोक 8)
देवताओं के गुरु, उतथ्य के छोटे भाई, महान उज्ज्वल बृहस्पति समागम की इच्छा के साथ ममता के पास पहुंचे।  (9)
ममता ने अपने देवर से कहा मैं तुम्हारे बड़े भाई के साथ गर्भवती हूं इसलिए इंतजार करो (10)
 मेरे गर्भ में उथयन के पुत्र बृहस्पति भी वेदों को यहाँ पढ़ रहे हैं (11)।
आप बांझ हैं, इसलिए यह आज ठीक नहीं है (12)।
इसके बावजूद, अधीर बृहस्पति अपनी आत्मा को संयमित नहीं कर सका।
(13)
उसे स्खलन करते देख, गर्भ में ऋषि ने कहा (14)
यहां दो होना संभव नहीं है, यह बहुत छोटा है जो मैं पहले ही आ चुका हूं। (15)
आपका वीर्य व्यर्थ नहीं जाएगा। मुझे परेशान मत करो, उस अजन्मे बच्चे की बात सुने बिना बृहस्पति (16)।
उसने ममता के साथ समागम आरम्भ कर दिया। जब वीर्य गर्भ में गिरा, गर्भ में बैठे ऋषि ने बृहस्पति के वीर्य को अवरुद्ध कर दिया (17)।
 जब वीर्य अचानक पृथ्वी पर गिर गया तो बृहस्पति क्रोधित हो गए (18)।
 बृहस्पति ने अपने वीर्य को गिरते हुए देखकर क्रोध में शाप दिया, ऋषि ने उत्थय के पुत्र को गर्भ में अंधे होने का श्राप दिया। (श्लोक 19, 20 देखें)
इस श्राप ने एक संत ऋषि को जन्म दिया जिसका नाम दीर्घतमा था जो बृहस्पति के समान तेजस्वी था (श्लोक २१)।
(महाभारत, आदिपर्व 104 में श्लोक 8 से 22)


 नोट: महाभारत प्रकाशन मंडल, दिल्ली संस्करण में यह कहानी आदिपर्व 103 में है और महाभारत प्रकाशन मंडल मराठी अनुवाद में, पुणे संस्करण यह कहानी आदिपर्व 98 में है

समलैंगिकता।


दावा है कि  मनुस्मृति 8/370 में राजा शब्द नहीं है।



 पर है। देखिए मनुस्मृति अनुवाद, जनार्दन झा पृष्ठ ३५५.


गिरिजा प्रसाद द्विवेदी ने 8/370 में अपने अनुवाद में राजा शब्द का उल्लेख नहीं किया है, लेकिन अध्याय 371 में उल्लेख किया गया है कि राजा दंड देता है। (मनुस्मृति अनुवाद, गिरिजा प्रसाद द्विवेदी पृष्ठ ३० ९)


21 वीं शताब्दी में मनुस्मृति, सुरेन्द्र कुमार अज्ञात पृष्ठ 429.


मनुस्मृति में समलैंगिकता का उल्लेख है।  मनुस्मृति अनुवाद, जनार्दन झा पृष्ठ।  470


गिरिजा प्रसाद द्विवेदी के अनुवाद में यह श्लोक 68वा है। मनुस्मृति अनुवाद, गिरिजा प्रसाद द्विवेदी पृष्ठ।  409


21 वीं शताब्दी में मनुस्मृति, सुरेन्द्र कुमार अज्ञात पृष्ठ।  387
 




 

आयुर्वेद में गौमांस।


गौ का मास श्वास खांसी जुकाम विषम ज्वर भस्मक रोग मे हितकारी  है||89|| 
(सुश्रुत संहिता हिंदी अनुवाद खंड 1, डाॅ. भास्कर गोविंद घाणेकर पृष्ठ 275) 



गाय का मास केवल वात रोग मे, पिनस मे, विषम ज्वर मे, सुखी खासी मे थकान मे अग्नि या मास के बहुत अधिक क्षय हो जाने मे हितकारी है. 
(चरक संहिता हिंदी अनुवाद, कविराज श्री अत्रिदेवजी गुप्त, पृष्ठ 335) 



इस पर आपत्ति जताई है कि गव्यम शब्द का अर्थ गौमांस नहीं है। लेकिन चरक संहिता और सुश्रुत संहिता के अनुवादकों ने गव्य की व्याख्या गौमास के रूप में की है। डॉ  घनेकर ने गव्य शब्द का अर्थ गौमास के रूप में लिया है। अत्रुदेवजी गुप्त ने भी गव्य शब्द का अर्थ गौमास के रूप में लिया है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में गाय, बैल, भैंस, भेड़, हिरण, मोर, सांप, भालू, सुअर, कई पक्षी, आदि का उल्लेख है।


सुरेन्द्र कुमार ज्ञात ने प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों से गोमांस खाने के प्रमाण दिए हैं। वह स्वयं एक संस्कृत पंडित ब्राह्मण हैं और उन्होंने भी गौमास शब्द का अर्थ गौमास लिया है। देखें क्या हिंदू धर्म बालू की भीत पर खड़ा है, सुरेंद्र कुमार अज्ञात, पृष्ठ 774.


 कुछ अन्य स्रोत:

 

Friday, 21 August 2020

बौद्ध अनुयायी को दैत्य असुर बताना।

बौद्ध अनुयायी को दैत्य असुर बताना।

अग्निपुराण के अनुसार, शुद्धोधन के पुत्र बुद्ध ने दैत्यों को बहकाया और उन्हें वैदिक धर्म छोड़ने के लिए कहा।

वे बुद्ध के अनुयायियों दैत्य, बौद्ध कहलाए। उन्होंने अन्य लोगों से वैदिक धर्म का त्याग करवाया।
(अग्निपुराण, अध्याय 16, गीताप्रेस गोरखपुर)


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पद्मपुराण में एक प्रसंग आता है, जिसमें शंकर पार्वती को बताते हैं कि शंकराचार्य का मायावाद का सिद्धांत प्रच्छन्न बौद्ध धर्म है।


ग्रंथों में सूर्य सम्बंधित ज्ञान।

ऋग्वेद में भयानक खगोल विज्ञान

दिप्तीमान और सर्वप्रकाशक सुर्य ! हरित् नाम के सात घोडे रथ मे तुम्हे ले जाते है. किरणे हि तुम्हारे केश है. ( मंत्र 8)
सुर्य ने रथवाहिका सात घोडीयों को रथ मे संयोजित किया. उन संयोजित घोडीयों द्वारा सुर्य गमन करते है.  (मंत्र 9) 
(इंडियन प्रेस, पब्लिकेशन्स, प्रयाग, ऋग्वेद सायणभाष्य हिंदी अनुवाद, पंडित रामगोविंद त्रिवेदी, पृष्ठ 67) 


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सूर्य के पैदा होने की कहानी (कथा)- 

                  अलग-अलग ऋषि-मुनि मनु ने अपने-अपने धर्म के पूरानी किताब-ग्रंथों के देवी-देवताओं ऋषि-मनु मनु आदि के पैदा होने की अलग-अलग कहानियाँ लिखी हैं।  कहानियों के मुख्य कलाकारों के नाम भले ही एक जैसे हों परन्तु उन्हें पैदा करने के तरीके व अलग-अलग कथा-कहानियों के रुप में अलग-अलग नाटक-ड्रामा यानि लीलाएं लिखी गयी हैं। फिर सभी धर्म के धर्माचारियों ने एकराय होकर सभी देवी-देवता, खलनायक आदि को विष्णु शिव ब्रह्मा व दुर्गा की नकल (अवतार) बताकर उन्हें एक-दूसरे के एक होने का भ्रम पैदा किया गया है।

        इसी तरहं शिव विष्णु  ब्रह्मा दुर्गा, हनुमान राम कृष्ण सप्तर्षि आदि के भी पैदा होने की श्लोक, छंद-सुक्त, आयत के रुप में अनेकों नाटक-ड्रामा यानी लीला व इनसे अनुवादित कथा-कहानियां लिखी गयी हैं।

         राजनीतिक पार्ट्रियों की तरहं ही हर धर्म के पहनावे चुनाव-चिन्ह (प्रतीक-चिन्ह), तिलक का डिजाइन स्मृति-संहिता, शारीरिक पहचान, झंडे आदि भी अलग अलग होते हैं।

सूर्य से सूर्य कैसे पैदा हुआ?

            एक कहानी के अनुसार जंगे-मैदान (कुरु-क्षेत्र, युद्ध-स्थल) में हारे हुए देवताओं की रक्षा के लिए प्रजापति दक्ष की कन्या अदिति ने सूर्य से उसके जैसा एक बेटे पैदा करने की प्रार्थना की। अदिति का पति कश्यप के होते हुए भी सूर्य ने उचित मौका मिलने पर अदिति की इच्छा पूरी करने का वादा किया। इंद्र ने भी चांद के साथ मिलकर गौतम की बीवी अहल्या के साथ ऐसा ही कारनामा कर चुके थे।
      
   जब सूर्य दिन के समय धरती का चक्कर लगा रहा था' तब उसी दौरान सूरज और अदिति के मिलन से अदिति गर्भवती हो गयी।  माना जाता है कि सनातन धर्म के सनातन काल में दाई की कोई जरुरत नही होती थी। उस काल में किसी आदमी द्वारा महिला के कान में पुंगी बजाने से, महिला द्वारा किसी मनुष्य को जी भरकर देखने से, हवा से, सूंघने से, मैल से, आशीर्वाद से, किसी आदमी की छाया महिला पर पडने से, लंगोट (अंडरवियर कच्छा) सूंघने से महिलाएँ गर्भवती हो जाती थीं और बिना किसी दाई के महिलाएँ डिलीवरी करने में एक्सपर्ट मानी जाती थीं। इसके अलावा भेड-बकरियों के बच्चों की तरहं सनातन काल की महिलाओं के बच्चे पैदा होते ही कपड़े पहने हुए दौडने, संस्कृत भाषा में बातचीत करने व धुआंधार लडाई भी करने लगते थे।

          अदिति के पेट से पैदा होते ही सूर्य ने असुरों से लडाई करते हुए, देवताओं की रक्षा की। सूर्य के बीज से अदिति के पेट से पैदा होने के कारण उसे मार्तण्ड भी कहा जाता है। अलग-अलग धर्म की किताब-ग्रंथों में सूर्य को Sun सूरज रवि भास्कर, प्रभाकर, दिनचर, आदित्य, मिहिर, रजनीश आदि नामों से या एक-दूसरे का अवतार भी बताया जाता है।

            सूर्य आदित्य लोक का रहने वाला है। इनके सात सफेद घोड़ों वाला रथ है। कहीं-कहीं सात घोडे की जगह सात घोडों के मुंह वाला एक घोडा बताया जाता है।  सूरज के चार हाथ हैं, जिनमें से दो हाथों में इन्होंने पद्म पकड़ा हुआ है तथा दो हाथ ऊपर-नीचे हवा में झूल रहे हैं।

सूर्य का परिवार- 

          हिंदु धर्म के नाम से कहे जाने वाले' रामानिज्म जैनिज्म अय्याविज्म आदि धर्मों की किताब-ग्रंथों के अनुसार सूर्य की मां का नाम अदिति तथा इनके बाप का नाम महर्षि कश्यप है। माना जाता है कि कश्यप कछुए से पैदा हुए थे। सूर्य की  प्रभा, उषा, दोपहरी, छाया, संध्या, छाया, संज्ञा व रजनी नाम की अनेकों बीवियां हैं।
        
        सूर्य के यम, कर्ण व शनि नाम के बेटे व सूवर्चला नाम की एक बेटी है। सूर्य का जवांई हनुमान को बताया जाता है। क्योंकि हनुमान अपने होने वाले ससुर सूर्य सेब समझ कर निगल गया था। तब राहुकेतु ने हनुमान का मुंह तौडकर सूर्य को हनुमान के मुंह से आजाद करवा दिया था।
   
       सूर्य और सूर्य के बेटे शनि के बीच पारिवारिक लडाई चल रही है। शनि देव को अपने बाप से शिकायत है कि उसके पिता छाया, संध्या व संज्ञा  के साथ दिनभर मौलमस्ती करते हैं और जब उनकी माता रजनी के आने का समय होता है तो सूर्य दिनभर की थकान उतारने के बहाने संध्या संज्ञा के साथ छुप जाते हैं। शनि अपने बाप सूर्य से बदला लेने के लिए सूर्य पर ग्रहण लगा देता है। खैर बाप बेटे में आज भी नोकझोंक चलती हुई बताई जाती है।
    
         अमेरिका के ऋषि-मुनियों ने चार अन्य सूर्यों के होने के बारे में पता लगाया है। पर ये कब कहां, कैसे व किसने पैदा किये हैं तथा उनके माता-पिता की खोजबीन की जा रही है।


Thursday, 20 August 2020

सती ग्रंथों में।

क्या मुस्लिम आक्रामकता के कारण सती होने लगी?


सती का पहला ऐतिहासिक प्रमाण गुप्त काल में मिलता है। महाराज भानुप्रताप के साथ रहे गोपराज युद्ध में मर जाते हैं और उनकी पत्नी सती हो जाती है। इस प्रथा के प्राचीनतम ऐतिहासिक साक्ष्य ई.पू. 510, एरण के शिलालेख में शानदार उल्लेख है कि सती का निधन हो गया।
(Early India, रोमिला थापर, पृष्ठ 237)


इयं नारी पतिलोक वृणाना निपद्दत उप त्वा मर्त्य प्रेतम् धर्म॔ पुराणमनुपालयंती तस्यै प्रजां द्रविणं चेह धेहि।।   
अर्थात : यह नारी स्वर्ग अर्थात पतिलोक को प्राप्त करने कि इच्छा से, हे मनुष्य तुझ मृत के समीप पहुँचती है. तुम्हारे साथ जल मर रही है, यह ऐसा पुरातन धर्म का पालन करती हुई कर रही है. इस तरह तुम्हारे साथ मर रही इस स्त्री को जन्मांतर मे इस लोक और परलोक मे भी तुम पिता पौत्र धन प्रदान करना.
(अथर्ववेद : 18/3/3 सायण-भाष्य) 

इमा नारीरविधवा: सुपत्नीरांजनेन सर्पिषा संविशंतु अनश्रवोsनमिवा: सुरत्ना आरोहंतु जनयो योनिमग्रे।।
अर्थात: ये नारीयां पति के साथ जल रही है, अंतः पति के साथ होने के कारण अविधवा है. इस के शरीरो पर घी मला हुआ है. आँखों मे अंजन लगा है. ये आंसशुन्य है, हे अग्नि ये तुम में प्रवेश कर रही है.  ताकी ये निर्दोष और सुंदर नारीयां अपनी पतियों से वियुक्त ना हो.
(ऋग्वेद 10/18/7 सायणभाष्य) 


रामायण में दशरथ की मृत्यु के बाद कौशल्या सती होने लगती है, लेकिन अन्य महिलाएं उनका विरोध करती हैं:
मैं महाराज के शरीर को आलिंगन कर अग्नी में प्रवेश करुंगी 
(वाल्मिकी रामायण, अयोध्याकांड 66/12) 


रामायण उत्तरकाण्ड में उल्लेख है कि जब कुशध्वज की मृत्यु शंभुदैत्य के हाथों हुई थी, तब उनकी पत्नी सती हुई थीं:
मेरी महाभागा माता को बडा दुःख हुआ और वो पिताजी के शव को ह्रदय से लगाकर चिता कि आग में प्रविष्ट हो गयी. 
(वाल्मिकी रामायण, उत्तरकांड 17/14) 


महाभारत में उल्लेख है कि पांडु की मृत्यु के बाद माधुरी सती हुई:
जनमेजय! कुंती से यह कह कर पांडु की यशस्विनी धर्मपत्नी माद्रि चिता कि आग पर रखे  हुये नरश्रेष्ठ पांडु के शव के साथ स्वयं भी चिता पर जा बैठी. 
(महाभारत, आदिपर्व 124/31) 



वासुदेव की मृत्यु के बाद उनकी 4 पत्नियां सती हो गईं:
युवतीओ में श्रेष्ठ देवकी, भद्रा, रोहिणी तथा मदिरा ये सब कि सब अपने पतीओ के साथ चिता पर आरुढ होने को उद्दत हो गयी (श्लोक 18) 
चिता कि प्रज्वलित अग्नि मे सोये हुए वीर शुरपुत्र वासुदेवजी के साथ उनकी पुर्वोक्त चारो पत्नीया भी चिता पर जा बैठी और उन्ही के साथ भस्म हो पतिलोक को प्राप्त हुई. (श्लोक 24)
(महाभारत, मौसलपर्व 7, श्लोक 18, 24) 


कृष्ण की मृत्यु के बाद उनकी 5 रानियां सती हो गईं:
रुक्मिणी, गांधारी, शैव्या, हैमवती और जांबवती ने पतिलोक कि प्राप्ती के लिए अग्नी मे प्रवेश किया. 
(महाभारत,मौसलपर्व 7/73) 


डॉ  सुरेंद्र कुमार अज्ञात ने गरुड़ पुराण के संदर्भ में सती के अनुष्ठान का उल्लेख किया है:
नारी अपने को सुहागिन कि तरह सजाये, अच्छे वस्त्र पहने, आखो मे अंजन लगाये. सुर्य को नमस्कार करके चिता कि परिक्रमा करे, चिता पर बैठ कर पति का सिर अपनी गोद मे रख ले. फिर सहेलीयों को आग लगाने को कहे. आग मे दुख को इस तरह जला दे मानो वह गंगा के शीतल जल मे डुबकी लगा रही हो. 
(गरुडपुराण 10/36-40) 


क्या बालु कि भीत पर खडा है हिंदु धर्म (सुरेंद्र कुमार अज्ञात), पृष्ठ 663

राजाराम मोहन रॉय के साहित्य से साबित होता है कि अगर कोई महिला सती होने के लिए तैयार नहीं होती थी, तो उसे भांग पिला हाथ-पैर बांध चिता पर फेंक दिए जाता था, डंडो के सहारे।

सहायक ग्रंथ :
1.अर्लि इंडिया (रोमिला थापर)
2.अथर्ववेद, सायणभाष्य, विश्वबुक प्रकाशन, दिल्ली. 
3.ऋग्वेद, सायणभाष्य, विश्वबुक प्रकाशन, दिल्ली 
4.वाल्मिकी रामायण, गीताप्रेस गोरखपूर 
5.महाभारत, गीताप्रेस गोरखपूर 
6.क्या बालु कि भीत पर खडा है हिंदु धर्म, सुरेंद्र कुमार अज्ञात, विश्वबुक प्रकाशन दिल्ली।

मूत्र द्वार।

तेरे मुत्र द्वार को में खोल देता हूं जैसे झिल का पानी बन्ध को खोल देता है । तेरे मूत्र मार्ग को खोल दिया गया है जैसे जल से भरे समुद्र का मार...